गाँव तक जाने लगी रुस्वाइयाँ
हाथ में आने लगी तन्हाइयाँ |
मौन छाया थक गयी शहनाइयाँ |
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शोहरत सिमटी रही घर द्वार तक ,
गाँव तक जाने लगी रुस्वाइयाँ |
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जिस्म पर जज़्बात के कर्जे कई,
जान खुद करने लगी भरपाइयाँ |
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यार जब साँसें थकी, दरिया थमा,
थाह की बहाने लगी गहराइयाँ |
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सोच में डूबी हुई अखबार में,
शाम को लिखती 'अलख' सच्चाइयाँ |
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